Lighting lamps On Thiruparankundram Hill – तमिलनाडु की TVK सरकार ने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीप जलाने की अनुमति देने वाले मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, लेकिन शीर्ष अदालत ने फिलहाल हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इस शुरुआती झटके ने सरकार की दलील को कमजोर कर दिया है, जबकि विवाद का धार्मिक और राजनीतिक दोनों पहलू फिर से सुर्खियों में आ गया है….
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मामला क्या है
यह विवाद थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर कार्तिकई दीपम के मौके पर प्राचीन पत्थर के खंभे, यानी “दीपथून”, पर पवित्र दीप जलाने की अनुमति से जुड़ा है। हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने जनवरी 2026 में सिंगल जज के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा था कि यह स्थल श्री सुब्रमण्य स्वामी मंदिर का हिस्सा है और इसमें वक्फ बोर्ड की भूमिका नहीं बनती।
कोर्ट ने उस दलील को भी खारिज किया था कि वहां दीप जलाने से कानून-व्यवस्था भंग हो जाएगी। हाई कोर्ट ने इसे “काल्पनिक डर” और “बेतुकी बात” कहा था।
सरकार क्यों गई सुप्रीम कोर्ट
तमिलनाडु सरकार ने हाई कोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सरकार का तर्क है कि पहाड़ी पर दीप जलाने से संवेदनशील इलाके में सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, क्योंकि पास में दरगाह भी मौजूद है।
सरकार यह भी कहना चाहती है कि धार्मिक अनुष्ठान को लेकर पारंपरिक स्थान वही था जहां पहले से प्रथा चली आ रही है, इसलिए पहाड़ी की चोटी पर दीप जलाने की अनुमति जरूरी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया
सुप्रीम कोर्ट की दो-सदस्यीय पीठ ने तमिलनाडु सरकार की याचिका पर मूल याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी किया, लेकिन हाई कोर्ट के आदेश पर तत्काल रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया। यानी मामला आगे सुनवाई के लिए तो स्वीकार हुआ, लेकिन सरकार को कोई तात्कालिक राहत नहीं मिली। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह इस मामले को दूसरे लंबित मामलों के साथ जोड़कर बाद में सुनेगा।
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हाई कोर्ट का रुख क्यों अहम है
मद्रास हाई कोर्ट का कहना था कि जिस स्थान पर पत्थर का खंभा है, वह मंदिर की जमीन है, इसलिए वहां धार्मिक परंपरा के अनुसार दीप जलाने से रोका नहीं जा सकता। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि सरकार का कानून-व्यवस्था बिगड़ने का दावा सिर्फ सुविधा के लिए गढ़ा गया डर है।
यह टिप्पणी इसलिए अहम है क्योंकि इसी ने पूरे विवाद को सिर्फ प्रशासनिक मुद्दे से उठाकर धार्मिक अधिकार और परंपरा के प्रश्न में बदल दिया।
विवाद की जड़
विवाद तब शुरू हुआ जब रामा रविकुमार और अन्य याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से मांग की कि कार्तिकई दीपम के अवसर पर उस पत्थर के खंभे पर पारंपरिक रूप से दीप जलाने की अनुमति दी जाए।
सिंगल जज ने याचिका स्वीकार कर ली थी, बाद में डबल बेंच ने भी आदेश बरकरार रखा। उसके बाद तत्कालीन डीएमके सरकार और फिर नई TVK सरकार ने भी इसे चुनौती दी।
राजनीतिक असर
यह सिर्फ मंदिर-परंपरा का मामला नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति का भी बड़ा सवाल बन गया है। पहले एमके स्टालिन सरकार ने इसे सांप्रदायिक तनाव का मुद्दा बताया, अब विजय सरकार भी उसी रुख को आगे बढ़ा रही है। दूसरी तरफ अदालत की टिप्पणियों ने सरकार की दलील को कमजोर दिखाया है और धार्मिक अधिकार के पक्ष को मजबूती दी है।
आगे क्या
अब मामला सुप्रीम कोर्ट में आगे सुना जाएगा, जहां यह तय होगा कि हाई कोर्ट का आदेश कायम रहेगा या उसमें कोई बदलाव होगा। चूंकि अभी रोक नहीं लगी है, इसलिए फिलहाल हाई कोर्ट का आदेश ही प्रभावी है। इसलिए आने वाले समय में यह विवाद कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर चर्चा में बना रहेगा।
निष्कर्ष
संक्षेप में, थिरुपरनकुंद्रम दीप विवाद में तमिलनाडु की TVK सरकार को सुप्रीम कोर्ट से शुरुआती झटका लगा है, क्योंकि अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक नहीं लगाई। हाई कोर्ट ने दीप जलाने की अनुमति दी थी और सरकार की कानून-व्यवस्था वाली दलील को खारिज किया था।
