कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भारत से टकराव – नेपाल में बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के महज एक महीने के भीतर ही भारत और नेपाल के बीच एक बड़ा राजनयिक विवाद खड़ा हो गया है। मुद्दा है — लिपुलेख दर्रे से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026। यह दोनों पड़ोसी देशों के बीच सीमा विवाद पर पहला मौखिक टकराव है, जो बालेन शाह के नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के एक महीने बाद सामने आया।


पूरा विवाद क्या है — शुरू से समझें

भारत के विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल 2026 को घोषणा की कि कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 जून से अगस्त के बीच आयोजित होगी। कुल 20 बैच होंगे, हर बैच में 50 यात्री। इनमें से 10 बैच उत्तराखंड के लिपुलेख पास और 10 बैच सिक्किम के नाथू ला पास से यात्रा करेंगे। यानी कुल 1,000 भारतीय तीर्थयात्री इस साल कैलाश मानसरोवर जाएंगे।

चीनी दूतावास ने इस यात्रा की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि वह 1,000 भारतीय तीर्थयात्रियों को इस साल आसानी पूर्वक तीर्थयात्रा कराने में सहयोग करेगा।

लेकिन नेपाल इससे खुश नहीं है — क्योंकि उसका दावा है कि लिपुलेख उसका इलाका है।


नेपाल की आपत्ति — क्या कहा बालेन सरकार ने?

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने 6 बिंदुओं का बयान जारी किया। बयान में कहा गया कि 1816 की सुगौली संधि के अनुसार महाकाली नदी के पूर्व के क्षेत्र — लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी — नेपाल के अभिन्न हिस्से हैं। नेपाल ने भारत और चीन दोनों को अपने रुख से अवगत कराया है।

नेपाल सरकार ने कहा — “हम भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को ध्यान में रखते हुए ऐतिहासिक समझौतों, तथ्यों, नक्शों और प्रमाणों के आधार पर कूटनीतिक माध्यमों से सीमा विवाद का समाधान चाहते हैं।”


कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भारत से टकराव
कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भारत से टकराव

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भारत ने दिया करारा जवाब

भारत ने नेपाल के क्षेत्रीय दावों को “untenable” यानी न टिकाऊ बताया। MEA प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत लगातार यह मानता रहा है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों तथा प्रमाणों पर आधारित हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि क्षेत्रीय दावों का एकतरफा और कृत्रिम विस्तार स्वीकार्य नहीं है। हालांकि भारत ने बातचीत का रास्ता खुला रखा है और कहा कि वह नेपाल के साथ सभी मुद्दों पर रचनात्मक संवाद के लिए तैयार है।

भारत ने स्पष्ट किया कि लिपुलेख से सीमा व्यापार 1954 से शुरू हुआ था और दशकों से जारी है।


बालेन शाह — विरोध पक्ष में थे, अब PM बनकर बदला रुख?

बालेन शाह का लिपुलेख मुद्दे पर रुख हमेशा से आक्रामक रहा है।

काठमांडू के मेयर रहते हुए उन्होंने 2023 में भारत की नई संसद में ‘अखंड भारत’ के भित्तिचित्र के जवाब में अपने दफ्तर में ‘Greater Nepal’ का नक्शा लगाया था।

जब पिछले साल अगस्त 2025 में KP शर्मा ओली SCO शिखर सम्मेलन के लिए चीन गए, तब बालेन शाह ने सोशल मीडिया पर लिखा था — “लिपुलेख दर्रे के रास्ते व्यापार फिर शुरू करने का भारत-चीन का समझौता हमारी संप्रभुता का अतिक्रमण है। चीन को यह याद दिलाना मत भूलिए कि यह हमारा है।”

लेकिन बालेन सरकार भारत की घोषणा के बाद लंबे समय तक चुप रही। रतोपति के सवाल उठाने के बाद ही नेपाल के विदेश मंत्रालय ने रविवार शाम 5 बजे खबर प्रकाशित होने के 3 घंटे बाद अपना 6 बिंदुओं वाला आधिकारिक बयान जारी किया।


लिपुलेख विवाद — पूरी पृष्ठभूमि

लिपुलेख विवाद भारत और नेपाल के बीच सबसे संवेदनशील सीमा विवादों में से एक है। यह मामला उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा क्षेत्र से जुड़ा है। नेपाल 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए दावा करता है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा उसका हिस्सा हैं।

दोनों देशों के बीच यह विवाद 2020 में तब और गहरा गया, जब भारत ने धारचूला से लिपुलेख तक 80 किलोमीटर सड़क का उद्घाटन किया था। इसके बाद नेपाल की KP शर्मा ओली सरकार ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया था।


भारत-चीन संबंध सुधरने से नेपाल की चिंता बढ़ी

भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध के कारण कैलाश मानसरोवर यात्रा और लिपुलेख से सीमा व्यापार सहित सभी प्रमुख द्विपक्षीय तंत्र जमे हुए थे। अक्टूबर 2024 में मामले के सुलझने के बाद संबंध सामान्य होने लगे।

अगस्त 2025 में भारत-चीन के विशेष प्रतिनिधियों की 24वीं बैठक में — भारत के NSA अजित डोवाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच — तीन पारंपरिक सीमा व्यापार मार्गों को फिर से खोलने पर सहमति बनी, जिसमें लिपुलेख भी शामिल है। नेपाल ने इस समझौते पर भारत और चीन दोनों को अलग-अलग राजनयिक नोट भेजे थे।


Nepal Airlines का शर्मनाक मामला — J&K को पाकिस्तान दिखाया

यह भी उल्लेखनीय है कि नेपाल एयरलाइंस ने एक बार J&K को पाकिस्तान के हिस्से के रूप में दिखाने वाला नक्शा शेयर किया था, जिसके बाद उसे ‘मानचित्रीय त्रुटि’ बताते हुए माफी मांगनी पड़ी।


नेपाल की घरेलू राजनीति — संकट के बीच PM बालेन

9 अप्रैल 2026 को श्रम मंत्री दीप कुमार शाह को पद से हटाया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने अपनी पत्नी को नेपाल स्वास्थ्य बीमा बोर्ड का सदस्य बनवाने के लिए पद का गलत इस्तेमाल किया।

गृहमंत्री सुदान गुरुंग के इस्तीफे ने सबसे बड़ा झटका दिया। एक विवादित कारोबारी से कथित संबंधों और शेयर लेन-देन के आरोपों के बीच उन्होंने पद छोड़ दिया। गुरुंग को मंत्री बने एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था। इस्तीफे के बाद गृह मंत्रालय अब सीधे पीएम बालेन शाह के पास है।


आगे क्या होगा — तीन बड़े सवाल

पहला — बालेन शाह की भारत यात्रा: खबरें हैं कि वे जल्द भारत दौरे पर आ सकते हैं। पूर्व राजदूत तंका कार्की का कहना है कि इस यात्रा में लिपुलेख का मुद्दा जरूर उठाया जाना चाहिए।

दूसरा — नेपाल का बड़ा बयान: नेपाल की विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संकेत दिया है कि वे इस मुद्दे पर अधिक संतुलित रुख अपनाएंगे। लिपुलेख जैसे मुद्दे सिर्फ शोर से नहीं, कूटनीति से सुलझते हैं।

तीसरा — कैलाश यात्रा का भविष्य: यात्रा जून से शुरू होनी है। अगर नेपाल अपना विरोध जारी रखता है तो इससे भारत-नेपाल संबंधों पर गंभीर असर पड़ सकता है।


निष्कर्ष

नेपाल में संवेदनशील मुद्दों पर अक्सर मात्र दिखावे होते हैं, जिससे समस्याएं सुलझने की बजाए और उलझ जाती हैं।

लिपुलेख विवाद कोई नया नहीं है — यह दशकों पुराना है। लेकिन बालेन शाह के PM बनने के बाद यह पहली बड़ी परीक्षा है कि वे विपक्ष में रहते हुए जो आक्रामक रुख अपनाते थे, वह अब PM पद की जिम्मेदारी के साथ कैसे बदलता है। भारत ने साफ संदेश दे दिया है — न तो ऐतिहासिक तथ्यों से समझौता होगा, न सीमा से।

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