Who Is Mohammad Junaid – जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों को खाना-पानी बांटने वाले जुनैद की कहानी अब आंदोलन से आगे बढ़कर पुलिस कार्रवाई और नागरिक अधिकारों के सवाल तक पहुंच गई है। जुनैद का आरोप है कि उन्हें बिना लिखित आदेश के उठाया गया, आंखों पर पट्टी बांधकर रखा गया और उनके परिवार को भी परेशान किया गया….
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जुनैद कौन हैं
जुनैद गाजियाबाद के रहने वाले हैं और 20 जून से जंतर-मंतर पर चल रहे CJP आंदोलन में लगातार मौजूद रहे। उनका काम प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था करना था, और वे दावा करते हैं कि यह सहायता अलग-अलग लोगों, संगठनों और लंगर से मिल रही थी।
उनके मुताबिक, उन्होंने किसी से नकद या ऑनलाइन चंदा नहीं लिया और न ही कोई QR कोड जारी किया। इसी वजह से वे कह रहे हैं कि उनके खिलाफ फंडिंग की जो शंका उठाई गई, उसका कोई आधार नहीं है।
क्या आरोप है
जुनैद का कहना है कि 24 जुलाई की रात, जब वे RML अस्पताल से इलाज कराकर लौट रहे थे, तभी सफेद स्कॉर्पियो में आए कुछ लोगों ने उन्हें रोका। उनका दावा है कि वे लोग सादे कपड़ों में थे, उन्होंने खुद को पुलिस बताया, लेकिन कोई वारंट या लिखित आदेश नहीं दिखाया।
इसके बाद, उनके अनुसार, उन्हें और उनके साथी को गाड़ी में बैठाकर आंखों पर पट्टी बांध दी गई, मोबाइल फोन ले लिए गए और उन्हें एक अज्ञात जगह ले जाया गया। जुनैद कहते हैं कि वहां उनसे अगले दिन तक पूछताछ हुई।
पूछताछ किस पर थी
जुनैद के मुताबिक, उनसे बार-बार यही पूछा गया कि वे गाजियाबाद से जंतर-मंतर क्यों आते हैं और प्रदर्शनकारियों के खाने का खर्च कौन उठा रहा है। उन्होंने जवाब दिया कि भोजन व्यवस्था दान, स्वैच्छिक सहयोग और लंगर के जरिए चल रही थी।
उनका यह भी कहना है कि पूछताछ के दौरान फंडिंग को लेकर संदेह जताया गया, जबकि उनके बैंक खाते में इस उद्देश्य से कोई पैसा नहीं आया। वे कहते हैं कि जांच एजेंसियां चाहें तो उनका रिकॉर्ड देख सकती हैं।
परिवार पर क्या हुआ
जुनैद का दावा है कि 23 और 24 जुलाई को यूपी पुलिस उनके घर पहुंची, उनके पिता को थाने ले जाया गया और बैंक पासबुक, आधार कार्ड जैसे दस्तावेज भी लिए गए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मेरठ में रहने वाली उनकी बहन के ससुर और देवर को भी थाने में बैठाया गया।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, गाजियाबाद पुलिस ने परिवार से पूछताछ की बात स्वीकार की है, लेकिन हिरासत में लेने से इनकार किया है। वहीं दिल्ली और मेरठ पुलिस की तरफ से इस आरोप पर स्पष्ट जवाब नहीं आया।
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कहां छोड़ा गया
जुनैद का दावा है कि कई घंटों तक वाहन में घुमाने के बाद उन्हें उत्तराखंड में देहरादून के पास या मसूरी क्षेत्र में छोड़ दिया गया। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि उन्हें वहीं टैक्सी लेकर दिल्ली लौटना पड़ा।
वे कहते हैं कि जाते समय उनसे कहा गया कि कुछ मिनट तक आंखों की पट्टी न खोलें और बाद में ही फोन चालू करें। उनके मुताबिक, डर की वजह से उन्होंने घटना की बात तुरंत सार्वजनिक नहीं की।
सबूत क्या हैं
जुनैद कहते हैं कि उनके पास RML अस्पताल की पर्ची, कैब बिल और उस इलाके के थाने की तस्वीरें हैं जहां उन्हें छोड़ा गया था। बीबीसी ने इनमें से कुछ दस्तावेज देखे भी हैं।
हालांकि, स्वतंत्र रूप से इस पूरी घटना की पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए यह मामला फिलहाल जुनैद के आरोपों, पुलिस की प्रतिक्रिया और अदालत में दाखिल याचिका के आधार पर ही आगे बढ़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका
जुनैद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनकी मांग है कि मामले की स्वतंत्र जांच हो, उनके और परिवार के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगे, और पूरी प्रक्रिया को कानूनी नजरिये से परखा जाए।
उनके अनुसार, उन्होंने केवल छात्रों की मदद की थी, कोई अपराध नहीं किया। इसलिए वे चाहते हैं कि अगर उनके साथ गलत हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो।
बड़ा सवाल क्या है
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की हिरासत की नहीं, बल्कि प्रदर्शन, निगरानी, फंडिंग और पुलिस कार्रवाई के बीच संतुलन की भी है। अगर जुनैद के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह नागरिक अधिकारों और प्रक्रिया की गंभीर अनदेखी का मामला होगा।
दूसरी ओर, अगर पुलिस के पास वैध आधार था, तो उसे अदालत में साफ करना होगा। अभी तक तस्वीर अधूरी है, लेकिन मामला निश्चित तौर पर संवेदनशील और राजनीतिक दोनों है।
निष्कर्ष
संक्षेप में, जुनैद का आरोप है कि जंतर-मंतर पर छात्रों को खाना बांटने की वजह से उन्हें हिरासत में लिया गया, आंखों पर पट्टी बांधी गई और परिवार पर दबाव बनाया गया। पुलिस की आधिकारिक प्रतिक्रिया सीमित है, और अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से इस विवाद की दिशा तय हो सकती है।

