Shiv Sena On The FCRA Bill – उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट बिल, 2026 (FCRA Bill) को लेकर मोदी सरकार को स्पष्ट संदेश दिया है। पार्टी ने कहा है कि अगर यह बिल देशहित में है और विपक्ष के साथ चर्चा की जाती है, तो वे इसके समर्थन से नहीं चूकेंगे। शिवसेना ने साफ किया कि वह हर चीज का विरोध नहीं करती, लेकिन विपक्ष को विश्वास में लिए बिना बहुमत के आधार पर बिल पास करना तानाशाही रवैया होगा….
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शिवसेना का क्या कहना है?
शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता आनंद दुबे ने न्यूज एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कहा कि एफसीआरए एक्ट नया नहीं है। यह कानून 1976 में इंदिरा गांधी के समय लाया गया था और उसके बाद कई बार संशोधन होते रहे हैं। दुबे ने कहा कि अभी तक उन्हें बिल का ड्राफ्ट नहीं मिला है, इसलिए विपक्ष चर्चा की मांग कर रहा है।
दुबे ने कहा, ‘अगर यह देश हित में है, अगर किसी के पास कोई ट्रस्ट या एनजीओ है और उसे विदेश से पैसे मिलते हैं, तब सरकार का अधिकार है कि वह स्रोत के बारे में जाने… चाहे कोई भी सरकार हो, चर्चा होनी चाहिए, अगर सब चंगा है तो जरूर इसका समर्थन किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शिवसेना (यूबीटी) का विरोध प्रक्रिया के खिलाफ है, न कि जरूरी नियमों के खिलाफ। दुबे ने कहा कि अगर विदेशी फंडिंग के जरिए अराजक तत्वों की एंट्री का कोई प्रूफ है, तो सरकार को जांच करनी चाहिए। लेकिन अगर सिर्फ राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए बिल लाया जा रहा है, तो इसका विरोध किया जाएगा।
विपक्ष की मुख्य चिंताएं क्या हैं?
विपक्षी दलों ने FCRA संशोधन बिल 2026 को लेकर संसद में भारी हंगामा किया है। कांग्रेस, सपा और लेफ्ट जैसे दलों ने आरोप लगाया है कि सरकार इस कानून के जरिए एनजीओ को नियंत्रित करना चाहती है। विपक्ष का कहना है कि बिल में कुछ प्रावधान असंवैधानिक हो सकते हैं और विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित संगठनों को निशाना बनाया जा सकता है।
संसद के बजट सत्र में पेश संशोधनों के तहत अब लोक सेवकों (Public Servants) को विदेशी फंडिंग प्राप्त करने से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके अलावा, नया विधेयक एक ‘डेजिग्नेटेड अथॉरिटी’ का गठन करने का प्रस्ताव करता है, जो उन मामलों में विदेशी योगदान और उससे खरीदी गई संपत्तियों की देखरेख करेगी जहां किसी संस्था का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द, सरेंडर या लैप्स हो गया हो।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार विपक्ष को विश्वास में नहीं ले रही है और सिर्फ लोकसभा और राज्यसभा में अपने बहुमत के आधार पर बिल पास करना चाहती है। शिवसेना ने इसे ‘तानाशाही’ और ‘अहंकारी’ रवैया बताया है।
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FCRA कानून क्या है?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 (FCRA, 2010) एक ऐसा कानून है जिसे व्यक्तियों, संस्थाओं और कंपनियों द्वारा विदेशी योगदान को स्वीकार करने और इस्तेमाल करने को विनियमित करने के लिए बनाया गया है। इसका मकसद विदेशी फंड को राष्ट्रीय हितों के लिए नुकसानदायक गतिविधियों पर असर डालने से रोकना, पारदर्शिता सुनिश्चित करना और NGOs के लिए विदेशी फंड पाने के लिए गृह मंत्रालय में रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी बनाना है।
सरकार का कहना है कि संशोधन बिल विदेशी अंशदान के उपयोग को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाएगा। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था कि यह विधेयक देश की सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए अनिवार्य है।
शिवसेना का संतुलित रुख
शिवसेना (यूबीटी) ने इस मामले में संतुलित रुख अपनाया है। पार्टी ने न तो बिल का पूरी तरह विरोध किया है और न ही बिना शर्त समर्थन दिया है। दुबे ने कहा, ‘जितने बड़े देश भक्त आप हैं, उससे एक-आध पर्सेंट ज्यादा ही देश भक्त हम हैं… आप किसी भी धर्म के हैं, आप विदेश से पैसा ला रहे हैं तो उन पैसों का हिसाब-किताब सरकार के पास होना चाहिए, यह स्वाभाविक सी प्रक्रिया है।’
पार्टी ने सरकार से मांग की है कि वह बिल का ड्राफ्ट विपक्ष को दिखाए और उस पर चर्चा करे। अगर सब कुछ ठीक है, तो शिवसेना समर्थन करने को तैयार है। यह रुख इंडिया ब्लॉक के भीतर एक मध्यम मार्ग के रूप में देखा जा सकता है, जहां कुछ दल बिल का पूरी तरह विरोध कर रहे हैं।
निष्कर्ष
FCRA संशोधन बिल 2026 को लेकर संसद में बहस जारी है। शिवसेना (यूबीटी) ने स्पष्ट किया है कि वह देशहित वाले विषयों का विरोध नहीं करती, लेकिन विपक्ष के साथ चर्चा और पारदर्शिता जरूरी है।
सरकार का कहना है कि यह बिल विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाएगा, जबकि विपक्ष को चिंता है कि इसका दुरुपयोग एनजीओ और अल्पसंख्यक संस्थाओं को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।
अब देखना यह है कि सरकार विपक्ष की चिंताओं को कैसे दूर करती है और क्या बिल पर व्यापक सहमति बन पाती है। शिवसेना का संदेश स्पष्ट है: प्रक्रिया सही हो और देशहित सुनिश्चित हो, तो विपक्ष समर्थन को तैयार है।

