India’s Import Bill Has Risen – भारत ने मई 2026 में रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चा तेल खरीदा, लेकिन इस बार कहानी पहले जैसी नहीं रही। जहां पहले रूस भारत को भारी डिस्काउंट पर तेल देता था, वहीं अब वही तेल प्रीमियम दाम पर बेचा जा रहा है। नतीजा यह हुआ कि भारत का आयात बिल बढ़ गया और रूस ने ज्यादा मात्रा के साथ ज्यादा कमाई भी कर ली….
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रूस की हिस्सेदारी क्यों बढ़ी?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मई 2026 में भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 40% से ज्यादा पहुंच गई, जो लगभग दो साल में सबसे ऊंचा स्तर है। भारत ने कुल 218.2 लाख टन तेल आयात किया, जो अप्रैल से करीब 12% ज्यादा था। हा��ांकि यह पिछले साल मई से थोड़ा कम था, लेकिन कीमतों में बड़ी तेजी के कारण कुल बिल काफी बढ़ गया।
डिस्काउंट की जगह प्रीमियम
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने भारत को लंबी अवधि तक सस्ते दामों पर तेल बेचा था। लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। मई 2026 में भारत ने आयातित तेल के लिए औसतन 106 डॉलर प्रति बैरल चुकाए, जबकि मई 2025 में यह आंकड़ा 64 डॉलर प्रति बैरल था।
यानी एक साल में तेल की औसत कीमत में बड़ा उछाल आया। रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस ने भारत को 916 डॉलर प्रति टन की दर से तेल बेचा, जबकि दूसरे वैश्विक स्रोतों से यह दर करीब 870 डॉलर प्रति टन थी। मतलब रूस ने प्रति टन लगभग 46 डॉलर ज्यादा वसूले।
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भारत का तेल बिल क्यों बढ़ा?
तेल की मात्रा में ज्यादा बदलाव नहीं था, लेकिन कीमत बढ़ने से भारत का कुल आयात बिल बुरी तरह ऊपर चला गया।
- अप्रैल 2026 की तुलना में आयात बिल 23.5% बढ़ा।
- पिछले साल मई की तुलना में यह 66% ज्यादा हो गया।
इसका असर सिर्फ विदेशी मुद्रा पर नहीं, बल्कि व्यापार घाटे और घरेलू महंगाई पर भी पड़ सकता है।
रूस महंगा क्यों बेच रहा है?
रिपोर्ट के मुताबिक रूस से महंगा तेल मिलने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। एक वजह यह है कि यूक्रेनी हमलों ने रूस के तेल उत्पादन और आपूर्ति को प्रभावित किया है। खुद रूस के कुछ हिस्सों में ईंधन की कमी की खबरें भी आई हैं। ऐसे में रूस के लिए सस्ते दाम पर लंबी अवधि की आपूर्ति बनाए रखना मुश्किल हुआ होगा।
दूसरी वजह यह है कि भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों की रूस पर निर्भरता बनी हुई है। जब सप्लाई सीमित होती है और खरीदार ज्यादा होते हैं, तो विक्रेता प्रीमियम वसूल सकता है।
भारत अभी भी रूस से क्यों खरीद रहा है?
यह सवाल सबसे अहम है। जब रूसी तेल अब पहले जितना सस्ता नहीं रहा, तो भारत इसे क्यों खरीद रहा है?
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण रिफाइनरी की सेटिंग है। भारतीय रिफाइनरियां महीनों से रूसी तेल के हिसाब से ऑपरेट कर रही हैं। अचानक किसी दूसरे देश का तेल लेने पर रिफाइनरी सिस्टम को फिर से एडजस्ट करना पड़ेगा, जिसमें समय और पैसा दोनों लगेंगे।
दूसरा कारण है कुल लागत का हिसाब। कई बार सिर्फ कच्चे तेल की प्रति टन कीमत देखकर फैसला नहीं लिया जाता। परिवहन, रिफाइनिंग, सप्लाई की स्थिरता और अनुबंध शर्तें मिलाकर देखा जाता है कि अंतिम लागत किस स्रोत से कम पड़ रही है। अगर रूसी तेल सिस्टम में फिट बैठता है, तो थोड़ा महंगा होने के बावजूद वह अभी भी व्यवहारिक विकल्प बन जाता है।
अमेरिका और दूसरे स्रोतों की भूमिका
भारत अब सिर्फ रूस पर निर्भर नहीं है। मई 2026 में भारत ने ईरान और वेनेजुएला से भी तेल खरीदना शुरू किया। इसके अलावा अमेरिका और UAE जैसे स्रोतों से भी तेल आयात हुआ, और वहां कीमतें औसत से कम रहीं। लेकिन मात्रा के लिहाज से रूस अभी भी सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है। यही वजह है कि भारत की ऊर्जा रणनीति में रूस की भूमिका बनी हुई है, भले ही शर्तें पहले जैसी अनुकूल न हों।
क्या इसका असर आगे भी रहेगा?
अगर रूस लंबे समय तक प्रीमियम वसूलता रहा, तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों की तरफ तेजी से जाना पड़ सकता है। हालांकि यह बदलाव एक दिन में नहीं होगा, क्योंकि रिफाइनरी, लॉजिस्टिक्स और आपूर्ति श्रृंखला को फिर से सेट करना आसान नहीं है। फिलहाल भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सस्ती, भरोसेमंद और स्थिर आपूर्ति का संतुलन कैसे बनाए रखे।
निष्कर्ष
रूस से भारत की रिकॉर्ड तेल खरीद ने यह साफ कर दिया है कि भू-राजनीति और ऊर्जा कारोबार में सिर्फ दोस्ती से काम नहीं चलता। रूस ने जहां भारत को भारी मात्रा में तेल बेचा, वहीं अब वह उसी सौदे से प्रीमियम मुनाफा कमा रहा है। भारत के लिए यह स्थिति बताती है कि ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ स्रोत बढ़ाने से नहीं, बल्कि कीमत और निर्भरता दोनों को संतुलित रखने से मिलेगी।
