China’s Medog Hydropower Station – तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रहा चीन का मेदोग हाइड्रोपावर स्टेशन सिर्फ दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना नहीं, बल्कि एक गंभीर भूगर्भीय जोखिम भी बनता जा रहा है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन के अपने वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह परियोजना एक सक्रिय फॉल्ट लाइन के ठीक ऊपर बन रही है, जिससे इसकी संरचनात्मक सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है…

क्या है यह प्रोजेक्ट?

मेदोग हाइड्रोपावर स्टेशन को चीन की अब तक की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना बताया जा रहा है। इसकी प्रस्तावित क्षमता 60,000 मेगावाट है, जो चीन के मौजूदा थ्री गॉर्जेस बांध से लगभग तीन गुना ज्यादा है. रिपोर्ट्स के अनुसार, इस परियोजना पर करीब 1 ट्रिलियन युआन यानी लगभग 137 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है, और इसे 2033 तक पूरा करने की योजना है.
यह बांध तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बन रहा है, जिसे भारत में ब्रह्मपुत्र कहा जाता है.

वैज्ञानिकों की चिंता क्या है?

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के हवाले से सामने आए अध्ययन में कहा गया है कि बांध स्थल के ठीक नीचे पैझेन फॉल्ट मौजूद है, जो एक सक्रिय भूकंपीय दरार है. शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यह फॉल्ट लाइन बांध, सुरंगों, पुलों, सड़कों और जलाशय क्षेत्र की संरचनात्मक स्थिरता को कमजोर कर सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में इस क्षेत्र में होने वाली कोई भी हलचल पूरे प्रोजेक्ट की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है.

इलाका कितना संवेदनशील है?

यह क्षेत्र पहले से ही भूकंप-प्रवण माना जाता है। रिपोर्ट में 2017 में आए 6.9 तीव्रता के भूकंप का भी जिक्र है, जो इसी फॉल्ट के उत्तरी हिस्से के पास आया था. वैज्ञानिकों का कहना है कि बार-बार होने वाली टेक्टोनिक हलचल ने इलाके की चट्टानों को कमजोर कर दिया है, जिससे इतना विशाल कंक्रीट ढांचा और जलाशय संभालना मुश्किल हो सकता है. इसके अलावा, आसपास की पहाड़ी संरचना ढीली होने के कारण भूस्खलन और ढहने का खतरा भी बढ़ सकता है.

भारत पर क्या असर?

भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि चीन पानी रोकेगा या नहीं, बल्कि यह है कि अगर यह बांध भूकंप या भूगर्भीय अस्थिरता के कारण असफल होता है तो नीचे के इलाके कितने सुरक्षित रहेंगे. ब्रह्मपुत्र भारत में प्रवेश करने के बाद अरुणाचल प्रदेश और असम से होकर बहती है, और भारत के पूर्वोत्तर हिस्से के लिए जीवनरेखा मानी जाती है. अगर ऊपर के हिस्से में अचानक पानी छोड़ा गया या किसी बड़े हादसे की स्थिति बनी, तो निचले इलाकों में फ्लैश फ्लड और जल-प्रलय जैसी स्थिति बन सकती है.

क्या चीन पानी रोक सकता है?

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन चाहकर भी ब्रह्मपुत्र का पानी पूरी तरह नहीं रोक सकता, क्योंकि ऐसा करने पर उसके अपने ऊपरी क्षेत्रों में गाद जमा होने और बाढ़ का खतरा बढ़ जाएगा. रिपोर्ट्स के मुताबिक, तिब्बत का हिस्सा कुल ब्रह्मपुत्र प्रवाह में लगभग 10 से 15 प्रतिशत ही योगदान देता है, जबकि भारत में आने के बाद मानसून और सहायक नदियां इसे और बड़ा बनाती हैं.
फिर भी, यह परियोजना पानी से ज्यादा सुरक्षा और भूगर्भीय जोखिम का मुद्दा बन गई है.

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China's Medog Hydropower Station
China’s Medog Hydropower Station

कूटनीतिक चिंता भी कम नहीं

भारत और बांग्लादेश इस परियोजना पर लगातार नजर रख रहे हैं, क्योंकि इसका असर दोनों देशों के डाउनस्ट्रीम इलाकों पर पड़ सकता है. भारतीय पक्ष ने चीन के सामने इस बांध के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है, लेकिन अभी तक कोई बाध्यकारी जल-साझाकरण समझौता मौजूद नहीं है. इसी वजह से यह प्रोजेक्ट केवल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक रणनीतिक और पर्यावरणीय चिंता भी है.

सबसे बड़ा खतरा क्या है?

सबसे डरावनी बात यह है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा बांध ऐसे इलाके में बनाया जा रहा है जहां खुद चीनी वैज्ञानिक भी भूकंपीय अस्थिरता की चेतावनी दे रहे हैं. अगर किसी बड़े भूकंप या भूस्खलन के कारण यह ढांचा कमजोर पड़ता है, तो उसका असर सिर्फ चीन तक सीमित नहीं रहेगा। भारत के अरुणाचल, असम और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह एक गंभीर आपदा में बदल सकता है.

निष्कर्ष

मेदोग हाइड्रोपावर स्टेशन चीन की महत्वाकांक्षा का प्रतीक जरूर है, लेकिन उसके साथ एक बड़ा खतरा भी जुड़ा है। चीन के अपने शोधकर्ता जिस सक्रिय फॉल्ट लाइन की बात कर रहे हैं, वह इस परियोजना को टाइम बम जैसा बना देती है. भारत के लिए असली चिंता यही है कि अगर यह विशालकाय बांध किसी भूगर्भीय झटके के आगे कमजोर पड़ा, तो ब्रह्मपुत्र बेसिन में तबाही का दायरा कितना बड़ा होगा.

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