Cyberattack On Nuclear Plant – कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़ी 19 हजार से ज्यादा संवेदनशील फाइलें डार्क वेब पर लीक होने का दावा सामने आया है। कहा जा रहा है कि यह डेटा लीक साइबर हैकर ग्रुप वर्ल्ड लीक्स ने किया है, लेकिन अब तक इन दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है….
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क्या दावा किया जा रहा है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह लीक करीब 8.58 लाख दस्तावेजों वाले बड़े डेटा ब्रीच का हिस्सा बताया जा रहा है। दावा है कि ये फाइलें कुडनकुलम परियोजना से जुड़े एक ठेकेदार के सर्वर से चुराई गईं। रिलायंस ग्रुप ने डेटा में आंशिक सेंध लगने की पुष्टि की है और कहा है कि प्रभावित सर्वर थर्ड-पार्टी डेटा सेंटर कंपनी योट्टा पर होस्ट था। कंपनी ने यह भी बताया कि मामले की जानकारी सरकार को दे दी गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कौन-सा डेटा प्रभावित हुआ।
किन फाइलों की बात हो रही है?
रिपोर्ट के अनुसार, लीक हुई फाइलों में कई तरह के संवेदनशील दस्तावेज होने का दावा है। इनमें शामिल हैं:
- वेंटिलेशन और कूलिंग सिस्टम के इंजीनियरिंग ब्लूप्रिंट।
- कंट्रोल रूम के फ्लोर प्लान।
- मशीनों और उपकरणों की जांच रिपोर्ट।
- सप्लायर और वेंडर्स की लिस्ट।
- मीटिंग रिकॉर्ड।
- बीमा से जुड़े दस्तावेज।
बताया जा रहा है कि ये ज्यादातर दस्तावेज यूनिट-3 और यूनिट-4 से जुड़े हैं, जो अभी निर्माणाधीन हैं। राहत की बात यह है कि अब तक ऐसी कोई पुख्ता जानकारी सामने नहीं आई है कि रिएक्टर के मुख्य सिस्टम का डिजाइन भी लीक हुआ हो।
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सुरक्षा को लेकर चिंता क्यों?
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, भले ही मुख्य रिएक्टर सिस्टम सुरक्षित हो, लेकिन ऐसी जानकारी भी खतरनाक हो सकती है।
दस्तावेजों से यह पता चल सकता है कि:
- परियोजना तक किसकी पहुंच है।
- कौन-सी प्रणालियां इस्तेमाल हो रही हैं।
- कौन-से वेंडर और ठेकेदार जुड़े हुए हैं।
ऐसी जानकारी का इस्तेमाल भविष्य में बड़े साइबर हमले की तैयारी के लिए किया जा सकता है। यानी खतरा केवल एक बार के ब्रीच तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लंबे समय तक सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है।
जांच कौन कर रहा है?
इस मामले की जांच CERT-In और NPCIL मिलकर कर रहे हैं। योट्टा ने बताया कि 29 मई को उसके एक सर्वर पर संदिग्ध गतिविधि पकड़ी गई थी और संभावित रैनसमवेयर हमले को रोक दिया गया। इसके बाद डेटा लीक की आशंका और मजबूत हुई।
रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने भी डेटा लीक के दावे की जानकारी मिलने की बात कही है।
मामला कितना गंभीर है?
अगर यह दावा सही साबित होता है, तो यह भारत के अहम बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए बड़ा अलार्म होगा। न्यूक्लियर प्लांट जैसे संवेदनशील संस्थानों से जुड़ी इंजीनियरिंग और ऑपरेशनल जानकारी का बाहर जाना सिर्फ डेटा चोरी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन सकता है। ऐसे मामलों में यह भी देखा जाता है कि कहीं किसी बाहरी एजेंसी या संगठित साइबर गिरोह का निशाना तो नहीं बनाया गया।
भारत में बढ़ता साइबर खतरा
यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब भारत में साइबर हमलों की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले वर्ष देश में 2.89 करोड़ से अधिक अकाउंट डेटा लीक से प्रभावित हुए थे। इससे साफ है कि अब खतरा केवल बैंक या सोशल मीडिया अकाउंट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी प्रोजेक्ट्स तक पहुंच चुका है।
अभी क्या साफ है?
फिलहाल तीन बातें स्पष्ट हैं:
- डेटा लीक का दावा किया गया है।
- कुछ स्तर पर सर्वर में सेंध की पुष्टि हुई है।
- लेकिन लीक हुई फाइलों की पूरी प्रामाणिकता अभी साबित नहीं हुई है।
यानी यह मामला गंभीर जरूर है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही निकलेगा।
निष्कर्ष
कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़ी फाइलों के डार्क वेब पर लीक होने का दावा भारत के साइबर सुरक्षा ढांचे के लिए चेतावनी जैसा है। भले ही मुख्य रिएक्टर सिस्टम के लीक होने का प्रमाण अभी न मिला हो, लेकिन इंजीनियरिंग ब्लूप्रिंट, फ्लोर प्लान और सप्लायर डेटा जैसी जानकारी भी बेहद संवेदनशील होती है। अब सबकी नजर CERT-In, NPCIL और अन्य एजेंसियों की जांच पर है, जिससे यह साफ हो सकेगा कि यह केवल डेटा ब्रीच था या किसी बड़े खतरे की शुरुआत।

