Indus Waters Treaty – पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर और सिंधु जल संधि यानी Indus Waters Treaty (IWT) को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की कोशिश की है। अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रिजवान सईद शेख ने वॉशिंगटन स्थित पाकिस्तानी दूतावास में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि कश्मीर विवाद का समाधान जरूरी है और इसके बिना दक्षिण एशिया में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकती…
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यह कार्यक्रम 5 अगस्त को मनाए जाने वाले पाकिस्तान के ‘यौम-ए-इस्तेहसाल’ के मौके पर आयोजित किया गया था। पाकिस्तान इस दिन को कश्मीर में कथित शोषण के विरोध के रूप में मनाता है। 5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया था। इसके बाद से पाकिस्तान लगातार इस फैसले के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बयान देता रहा है।
अमेरिका में क्या बोले पाकिस्तानी राजदूत?
वाशिंगटन में आयोजित कार्यक्रम का विषय था-‘दक्षिण एशिया में अंतरराष्ट्रीय कानून के सामने समकालीन चुनौतियां: जम्मू-कश्मीर विवाद और सिंधु जल संधि।’ कार्यक्रम में रिजवान सईद शेख ने कहा कि कश्मीर विवाद और क्षेत्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन जरूरी है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कश्मीर में स्थिति लगातार कठिन होती जा रही है। उनके मुताबिक, दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के लिए भारत और पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान को कश्मीर और सिंधु जल संधि पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अपनी अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता का इस्तेमाल करना चाहिए।
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पाकिस्तानी राजदूत ने भारत से अपनी कानूनी जिम्मेदारियां पूरी करने की मांग भी दोहराई। हालांकि, उनके बयान में पाकिस्तान के उन आरोपों को ही दोहराया गया है जिन्हें भारत पहले भी खारिज करता रहा है। भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है और इससे जुड़े मुद्दे द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से ही सुलझाए जा सकते हैं।
कश्मीर और सिंधु जल संधि को जोड़ने की कोशिश
इस कार्यक्रम में कश्मीर विवाद और IWT को एक साथ जोड़कर चर्चा की गई। पाकिस्तान का तर्क है कि दोनों मुद्दों के राजनीतिक, आर्थिक और भौगोलिक प्रभाव हैं। इस्लामाबाद लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि भारत सिंधु जल संधि के प्रावधानों का उल्लंघन कर रहा है।
सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मदद से हुई थी। इसके तहत सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों के पानी का प्रमुख उपयोग पाकिस्तान को मिला, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज नदियों के पानी पर भारत के अधिकार तय किए गए। विश्व बैंक के अनुसार, संधि में विवादों और मतभेदों के समाधान के लिए अलग-अलग प्रक्रियाओं का प्रावधान है, लेकिन बैंक की भूमिका सीमित और प्रक्रियात्मक है।
भारत का मौजूदा रुख क्या है?
भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को ‘अबेयन्स’ यानी निष्क्रिय स्थिति में रखने की घोषणा की थी। भारत का कहना है कि सीमा पार आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। विदेश मंत्रालय ने जुलाई 2026 में फिर दोहराया कि संधि तब तक निष्क्रिय रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का समर्थन विश्वसनीय और स्थायी रूप से बंद नहीं करता।
भारत की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि संधि अपने मौजूदा स्वरूप में आगे काम नहीं कर सकती। नई दिल्ली का तर्क है कि सुरक्षा चिंताओं, बदलती परिस्थितियों और जलवायु परिवर्तन के कारण समझौते की समीक्षा जरूरी हो गई है।
चीन और अमेरिका का सहारा लेने की रणनीति
कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत मुनीर अकरम ने कहा कि चीन के साथ पाकिस्तान की मजबूत रणनीतिक साझेदारी है और अमेरिका के साथ भी उसके संबंध बेहतर हैं। उनका दावा था कि इन रिश्तों के कारण पाकिस्तान कश्मीर और अपने जल अधिकारों की वकालत करने की बेहतर स्थिति में है।
पाकिस्तान की रणनीति यह दिखाई देती है कि वह चीन और अमेरिका दोनों के साथ अपने संबंधों का इस्तेमाल भारत पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने के लिए करना चाहता है। चीन पाकिस्तान का करीबी रणनीतिक साझेदार है, जबकि अमेरिका के साथ इस्लामाबाद हाल के वर्षों में सुरक्षा, कूटनीति और क्षेत्रीय मुद्दों पर संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, यह कहना अलग बात है कि अमेरिका या कोई अन्य देश भारत-पाकिस्तान के विवाद में औपचारिक मध्यस्थता स्वीकार करेगा।
क्या पाकिस्तान को फायदा मिलेगा?
पाकिस्तान के लिए कश्मीर और पानी के मुद्दे को अमेरिका में उठाना अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश है। लेकिन भारत लगातार कहता रहा है कि कश्मीर द्विपक्षीय विषय है और किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की जाएगी। ऐसे में वॉशिंगटन में बयान देने से पाकिस्तान अपनी बात जरूर रख सकता है, पर इससे भारत की नीति तुरंत बदलने की संभावना नहीं है।
सिंधु जल संधि को लेकर भी दोनों देशों के बीच कानूनी और राजनीतिक मतभेद गहरे हैं। पाकिस्तान संधि के पुराने प्रावधानों के आधार पर अपने अधिकारों की बात कर रहा है, जबकि भारत सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे को इससे जोड़ रहा है।
निष्कर्ष
पाकिस्तानी राजदूत का ताजा बयान कश्मीर और सिंधु जल संधि को एक ही कूटनीतिक अभियान में जोड़ने की कोशिश है। पाकिस्तान चीन के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी और अमेरिका के साथ बेहतर होते संबंधों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहता है।
हालांकि, भारत का रुख स्पष्ट है कि कश्मीर पर किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं होगी और सिंधु जल संधि तब तक निष्क्रिय रहेगी, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर ठोस और अपरिवर्तनीय कार्रवाई नहीं करता।

