FIR Against Pappu Yadav – पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी विवाद के केंद्र में आ गए हैं। अयोध्या के राम मंदिर में चंदे की कथित अनियमितताओं के खिलाफ संसद परिसर में हुए विरोध प्रदर्शन और सांकेतिक नाटक के बाद वाराणसी के कोतवाली थाने में राहुल गांधी, पप्पू यादव और अयोध्या-फैजाबाद से सांसद अवधेश प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। इस मामले ने न केवल सियासी तापमान बढ़ा दिया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या इन नेताओं को जेल जाना पड़ सकता है।…
एफआईआर दर्ज होने के बाद पप्पू यादव ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि वे सच बोलने से पीछे नहीं हटेंगे और धार्मिक आस्था के नाम पर “गद्दारी और लूट” करने वालों के खिलाफ खड़े रहेंगे। पप्पू यादव ने यह भी कहा कि वे “कफन बांधकर” निकलते हैं और उन्हें मुकदमों से डर नहीं लगता। उनके इस बयान के बाद यह विवाद और ज्यादा राजनीतिक रंग लेता दिख रहा है।
यह मामला संसद परिसर में हुए उस प्रदर्शन से जुड़ा है, जिसमें कथित तौर पर राम मंदिर चंदा प्रकरण और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर विरोध जताया गया था। बीजेपी और उससे जुड़े संगठनों ने इसे सनातन धर्म का अपमान बताया है, जबकि विपक्षी खेमे का कहना है कि यह मुद्दा धार्मिक आस्था के साथ कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने से जुड़ा है।
अब सबसे बड़ा कानूनी सवाल यह है कि क्या संसद परिसर के भीतर हुए प्रदर्शन के लिए बाहर किसी थाने में एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है? संवैधानिक जानकारों के मुताबिक, संसद के भीतर सांसदों को भाषण और गतिविधियों के लिए विशेषाधिकार प्राप्त हैं। संविधान के अनुच्छेद 105(2) के तहत संसद के अंदर कही गई बातों पर सीधे कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। हालांकि, अगर शिकायत इस आधार पर है कि किसी कृत्य से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं, तो पुलिस शुरुआती स्तर पर मामला दर्ज कर सकती है।
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लेकिन संसद परिसर का पूरा क्षेत्र संसद अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए पुलिस की कार्रवाई वहां सीधे और स्वतंत्र रूप से सीमित मानी जाती है। इसी वजह से यह भी माना जा रहा है कि अगर मामला अदालत तक पहुंचा, तो सांसदों के विशेषाधिकार का मुद्दा एक मजबूत कानूनी ढाल बन सकता है। यही कारण है कि इस एफआईआर के टिकने या न टिकने पर कानूनी बहस तेज हो गई है।
वाराणसी पुलिस ने यह मामला भारतीय न्याय संहिता की धारा 196, 299 और 302 के तहत दर्ज किया है। इनमें समूहों के बीच शत्रुता बढ़ाने, धार्मिक भावनाएं आहत करने और संबंधित अपराधों के प्रावधान शामिल हैं। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, इन धाराओं में अधिकतम सजा 3 से 5 साल तक है। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के मुताबिक 7 साल से कम सजा वाले मामलों में आमतौर पर सीधी गिरफ्तारी नहीं की जाती। इसलिए फिलहाल तत्काल गिरफ्तारी की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।
कानूनी प्रक्रिया के तहत पुलिस पहले आरोपियों को नोटिस भेजेगी, बयान दर्ज करेगी और जांच आगे बढ़ाएगी। इसके बाद ही किसी गिरफ्तारी या चार्जशीट की दिशा में कदम उठाया जा सकता है। इस बीच, पप्पू यादव और अन्य नेताओं के लिए अग्रिम जमानत या एफआईआर रद्द कराने की याचिका दायर करना भी एक संभावित रास्ता है। ऐसी स्थिति में वे इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
राजनीतिक नजरिये से देखें तो यह मामला आने वाले समय में और बड़ा हो सकता है। विपक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज के रूप में पेश कर सकता है, जबकि बीजेपी इसे सनातन धर्म के अपमान और धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ के रूप में उछाल सकती है। 2027 के चुनाव और आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह विवाद दोनों खेमों के लिए राजनीतिक हथियार बन सकता है।
फिलहाल स्थिति यह है कि एफआईआर दर्ज हो चुकी है, राजनीतिक बयानबाजी तेज है और कानूनी प्रक्रिया शुरू होने वाली है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर पप्पू यादव या अन्य नेताओं की तत्काल जेल जाने की संभावना बहुत कम दिखती है। असली फैसला जांच, अदालत की सुनवाई और संसद से जुड़े विशेषाधिकारों की व्याख्या पर निर्भर करेगा।

