China Quietly Pursuing A Strategy – दुनिया भर के देश जहां आर्थिक मंदी और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रहे हैं, वहीं चीन बड़ी खामोशी से एक ऐसी रणनीति पर काम कर रहा है जिसने दुनियाभर के विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। चीन एक बार फिर रिकॉर्ड गति से दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर संसाधन सोना और कच्चा तेल जमा कर रहा है…

सोने का अकूत भंडार

क्रिप्टो और डॉलर से इतर, चीन अपनी वित्तीय संप्रभुता को पूरी तरह से ‘हैक-प्रूफ’ और सुरक्षित बनाने में लगा है। पीपल्स बैंक ऑफ चाइना (PBOC) ने जुलाई 2026 में 6,40,000 औंस (लगभग 20 टन) सोने की भारी-भरकम खरीदारी की है, जो अक्टूबर 2023 के बाद उसकी सबसे बड़ी एकल माह की वृद्धि है। यह लगातार 21वां महीना है जब चीनी केंद्रीय बैंक ने अपने आधिकारिक स्वर्ण भंडार में इजाफा किया है।

इस नई खरीदारी के साथ ही चीन के कुल आधिकारिक स्वर्ण भंडार की कीमत 306 अरब डॉलर के विशाल आंकड़े को पार कर गई है। पश्चिमी देशों के वित्तीय नेटवर्क और पाबंदियों से बचने के लिए चीन लंदन में रखे अपने ऐतिहासिक सोने के स्टॉक का एक बड़ा हिस्सा हांगकांग ट्रांसफर कर रहा है, ताकि एशिया में सोने की कीमतों का एक स्वतंत्र ‘प्राइसिंग हब’ बनाया जा सके।

चीन का यह कदम डॉलर पर निर्भरता कम करने और ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए है जो पश्चिमी देशों के प्रभुत्व के खिलाफ बड़ा कदम है। ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से बताया कि चीन का केंद्रीय बैंक शंघाई गोल्ड एक्सचेंज के जरिए मित्र देशों के केंद्रीय बैंकों को सोना खरीदने और उसे चीन में जमा करने के लिए बढ़ावा दे रहा है।

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China Quietly Pursuing A Strategy
China Quietly Pursuing A Strategy

1.4 बिलियन बैरल कच्चे तेल का ‘हथियार’

सिर्फ सोना ही नहीं, चीन ने कच्चे तेल का भी एक ऐसा विशालकाय भंडार तैयार कर लिया है, जिसे अब उसका सबसे बड़ा आर्थिक हथियार माना जा रहा है। रैंड (RAND) की एक नई स्टडी के मुताबिक, चीन ने अपनी रणनीतिक और एंटरप्राइज इन्वेंट्री में 1.4 अरब बैरल कच्चा तेल जमा कर लिया है। यह भंडार अमेरिका के रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व में मौजूद 413 मिलियन बैरल से तीन गुना से भी अधिक है।

प्राइसवाटरहाउसकूपर्स (PwC) के विशेषज्ञों के अनुसार, यह विशाल भंडार चीन को ग्लोबल मार्केट में ‘प्राइम परचेजिंग पावर’ देता है। इसका मतलब है कि ड्रैगन अब ओपेक की तरह ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को अपनी मर्जी से घटा या बढ़ा सकता है।

चीन ने यह करिश्मा रातों-रात नहीं किया, बल्कि इसके पीछे बीजिंग की दो दशक पुरानी सोची-समझी रणनीति थी। जेवियर ब्लास का तर्क है कि ईरान संघर्ष के दौरान चीन ने इतिहास में पहली बार ‘स्विंग इंपोर्टर’ की भूमिका निभाई। चीनी कस्टम्स के आंकड़ों के मुताबिक, मई में चीन का कुल तेल आयात 8 साल के निचले स्तर पर आ गया।

भारत के लिए यह खतरे की घंटी क्यों है?

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। ग्लोबल मार्केट में चीन का यह दबदबा भारत के लिए एक भयानक ‘प्राइस शॉक’ साबित हो सकता है।

अगर चीन बाजार में अपना तेल उतारता है या भारी मात्रा में अचानक खरीदता है, तो कीमतों में बेतहाशा उतार-चढ़ाव आ सकता है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने का सीधा मतलब है कि भारत का आयात बिल बढ़ेगा, रुपया कमजोर होगा और ट्रांसपोर्टेशन से लेकर खाद तक हर चीज आम आदमी के लिए महंगी हो जाएगी।

चीन की क्षमता है कि वह भारी मात्रा में डिस्काउंटेड रूसी और ईरानी तेल खरीद सकता है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों के लिए कॉम्पीटीशन बढ़ेगा और उन्हें मिलने वाला डिस्काउंट कम हो जाएगा।

सोने की कीमतों पर असर

साल 2025 में सोने की कीमतें आसमान छू रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह तेजी जारी रहेगी। चीन लगातार सोना खरीद रहा है, जिससे भारत की चिंता बढ़ सकती है। सोने की बढ़ती कीमतें भारत के आयात बिल को बढ़ा सकती हैं।

SBI की रिपोर्ट में कहा गया है कि सोना अब सिर्फ गहनों या निवेश की चीज नहीं, बल्कि देश की आर्थिक मजबूती और अंतरराष्ट्रीय रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने सोने को अपनी आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय ताकत की रणनीति का हिस्सा बना लिया है।

साल 2024 में भारत की कुल सोने की मांग 802.8 टन रही, जो दुनिया की कुल मांग का करीब 26% है। इस तरह भारत, चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना खरीदने वाला देश है। लेकिन 2025 की तीसरी तिमाही में सोने के दाम बहुत बढ़ने से मांग में गिरावट आई।

चीन की रणनीति का मकसद

चीन की यह ‘खामोश लेकिन आक्रामक’ रणनीति साफ इशारा कर रही है कि वह भविष्य के किसी भी बड़े वैश्विक संकट के लिए खुद को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना रहा है। यह रणनीति ताइवान पर कब्जे की उसकी तैयारी का संकेत समझा जा रहा है।

चीन का यह कदम भारत के लिए जटिल आर्थिक और राजनीतिक चुनौती पेश करता है। उसकी यह रणनीति डॉलर पर निर्भरता कम करने और ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए है जो पश्चिमी देशों के प्रभुत्व के खिलाफ बड़ा कदम है। इसका सीधा असर भारत पर भी पड़ेगा।

भारत के लिए सबक

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ओडिशा, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में नए सोने के भंडार मिले हैं, जो आगे चलकर देश की आयात निर्भरता कम करने में मदद कर सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक के पास अब लगभग 880 टन सोना है। यह देश के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का करीब 15.2% हिस्सा बन चुका है।

SBI रिपोर्ट कहती है कि भारत के पास भी यह बड़ा मौका है। वह चाहे तो सोने को अपनी आर्थिक सुरक्षा और नीति का मजबूत कवच बना सकता है। अब RBI की नीति है कि ज्यादा से ज्यादा सोना देश के अंदर ही सुरक्षित रखा जाए, ताकि किसी अंतरराष्ट्रीय संकट या प्रतिबंध की स्थिति में जोखिम कम किया जा सके।

निष्कर्ष

चीन की सोना और तेल जमा करने की रणनीति सिर्फ आर्थिक सुरक्षा नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक शक्ति बढ़ाने का हथियार है। भारत के लिए यह चुनौतीपूर्ण स्थिति है, लेकिन साथ ही यह सबक भी है कि कैसे अपनी आर्थिक सुरक्षा को मजबूत बनाया जाए।

अब देखना यह है कि भारत इस चुनौती का कैसे सामना करता है और क्या वह अपनी ऊर्जा और वित्तीय सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए ठोस कदम उठाता है।

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