Crude Oil Becomes Cheaper For India – मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ने और होर्मुज़ स्ट्रेट के फिर से बंद होने की खबरों के बीच भारत के लिए रूसी कच्चे तेल को लेकर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई है। एक तरफ वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ी है, तो दूसरी तरफ भारत ने रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चा तेल खरीदा है। इसी बीच शिपिंग कॉस्ट में गिरावट आने से रूसी तेल भारत के लिए और भी सस्ता हो गया है, जबकि अमेरिका की 500 प्रतिशत तक टैरिफ वाली धमकी एक बार फिर चर्चा में है…

रूस से रिकॉर्ड खरीदारी

जून 2026 में भारत और रूस के बीच कच्चे तेल का व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। Center for Research on Energy and Clean Air यानी CREA के डेटा के मुताबिक, भारत ने रूस से करीब 4.5 बिलियन यूरो का कच्चा तेल खरीदा। यह पिछले महीनों की तुलना में मजबूत उछाल को दिखाता है। भारत चीन के बाद रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बना हुआ है, और हाल के महीनों में भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से तेल खरीदने की रफ्तार और बढ़ा दी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जून में भारत का कुल कच्चे तेल आयात भी 5.4 प्रतिशत बढ़ा। इसका मतलब यह है कि भारत की रिफाइनिंग जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं और रूस अभी भी सबसे व्यवहारिक सप्लायर बना हुआ है।

रूसी तेल और सस्ता कैसे हुआ?

भारत के लिए रूसी तेल अब केवल उपलब्ध ही नहीं, बल्कि सस्ता भी हो गया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई में पश्चिमी बंदरगाहों से भारत के लिए रूसी तेल ले जाने वाले जहाजों के भाड़े में भारी कटौती की गई है। बाल्टिक पोर्ट से भारत आने वाले 1,00,000 मीट्रिक टन क्षमता वाले एफ़्रामैक्स जहाजों का किराया 10-11 मिलियन डॉलर से घटकर 7-8 मिलियन डॉलर रह गया है। इसी तरह ब्लैक सी पोर्ट से भारत आने वाले 1,40,000 टन क्षमता वाले सुएज़मैक्स टैंकरों का किराया 15 मिलियन डॉलर से गिरकर 10 मिलियन डॉलर तक आ गया है।

इसका सीधा असर यह हुआ है कि रूस से तेल आयात की कुल लागत कम हुई है। जब क्रूड की कीमत और शिपिंग कॉस्ट दोनों घटें, तो रिफाइनरियों के लिए खरीद और प्रोसेसिंग दोनों आसान हो जाती हैं। यही वजह है कि भारत ने रूस से खरीदारी और बढ़ा दी है।

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Crude Oil Becomes Cheaper For India
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होर्मुज़ बंद होने का असर

दूसरी ओर होर्मुज़ स्ट्रेट के फिर से बंद होने की खबर ने वैश्विक बाजार में चिंता बढ़ा दी है। यह वही समुद्री रास्ता है, जिससे दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। पहले जब यह मार्ग बाधित हुआ था, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। अगर स्थिति फिर उसी दिशा में गई, तो भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर दबाव और बढ़ सकता है।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80 से 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, इसलिए होर्मुज़ की अस्थिरता उसके लिए सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक संकट का भी संकेत है। तेल महंगा हुआ तो आयात बिल, महंगाई और व्यापार घाटा तीनों पर असर पड़ सकता है।

ट्रंप की टैरिफ धमकी

रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिका की तल्खी भी कम नहीं हुई है। इससे पहले अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीदने को लेकर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया था, जिसे बाद में हटा दिया गया। अब चर्चा है कि अमेरिका एक नए सैंक्शंस बिल की तैयारी कर रहा है, जिसमें रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की संभावना हो सकती है। बताया जा रहा है कि अमेरिका के कुछ सीनेटर ट्रंप प्रशासन के साथ मिलकर इस कानून को आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं।

अगर ऐसा हुआ, तो भारत के लिए यह बड़ा कूटनीतिक और व्यापारिक झटका होगा। भारत को रूस से सस्ती और स्थिर सप्लाई मिल रही है, लेकिन अमेरिका की सख्ती से इस व्यापार पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत की दुविधा

भारत के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती संतुलन की है। एक तरफ उसे सस्ता और पर्याप्त कच्चा तेल चाहिए, दूसरी तरफ उसे अमेरिका और पश्चिमी प्रतिबंधों की राजनीति से भी बचना है। रूसी तेल भारत के लिए अब भी व्यावहारिक विकल्प है क्योंकि भारतीय रिफाइनरियां इसके हिसाब से तैयार हो चुकी हैं। अचानक किसी दूसरे स्रोत पर शिफ्ट करना आसान नहीं होगा, क्योंकि उसमें लागत, समय और सप्लाई सुरक्षा की नई समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

आगे क्या?

अगर होर्मुज़ बंद रहा और अमेरिका ने नए प्रतिबंधों की दिशा में कदम बढ़ाया, तो वैश्विक तेल बाजार और भी अस्थिर हो सकता है। ऐसे में भारत की रणनीति यह होगी कि वह एक साथ कई स्रोतों से तेल खरीदकर जोखिम कम करे। रूस अभी भी उस रणनीति का सबसे अहम हिस्सा बना हुआ है, भले ही उसके साथ जुड़ा भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ता जा रहा हो।

निष्कर्ष

मौजूदा हालात में भारत को एक ओर सस्ता रूसी तेल मिल रहा है, दूसरी ओर वैश्विक राजनीति में उसके ऊपर दबाव भी बढ़ रहा है। रूस से रिकॉर्ड खरीद, शिपिंग कॉस्ट में कमी और होर्मुज़ संकट ने भारत की ऊर्जा रणनीति को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
लेकिन अगर अमेरिका 500 प्रतिशत टैरिफ जैसी सख्ती पर आगे बढ़ता है, तो यह राहत ज्यादा समय तक टिक नहीं सकती। फिलहाल भारत के लिए यह फायदेमंद सौदा है, मगर इसके पीछे जोखिम भी उतना ही बड़ा है।

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