Netanyahu Made An Unnecessary Remark – इजरायल और ईरान के बीच बढ़े तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच फोन पर बातचीत हुई। बातचीत के बाद नेतन्याहू ने दावा किया कि इजरायल को भारत का पूरा समर्थन मिल रहा है। लेकिन भारत के पूर्व राजनयिक महेश सचदेवा ने इस टिप्पणी को अनावश्यक बताया है। उनका कहना है कि नेतन्याहू का बयान भारत के वास्तविक रुख को सही तरीके से पेश नहीं करता….

सचदेवा के मुताबिक, भारत ने ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं किया है। ऐसे में भारत का नाम इजरायल के समर्थन में इस्तेमाल करने से नई दिल्ली की संतुलित कूटनीतिक नीति को अलग अर्थ मिल सकता है। भारत इजरायल के साथ अपने रणनीतिक संबंध बनाए रखते हुए पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और बातचीत के जरिए समाधान की वकालत करता रहा है।

पूर्व राजनयिक ने क्या कहा?

समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में महेश सचदेवा ने कहा कि पश्चिम एशिया का संकट इस समय निर्णायक मोड़ पर है। इस स्थिति में शामिल पक्षों के सामने दो रास्ते हैं-या तो सैन्य तनाव को और बढ़ाया जाए या बातचीत के जरिए समाधान निकाला जाए।

उन्होंने कहा कि फिलहाल तनाव बढ़ाने का सिलसिला कुछ हद तक रुकता दिखाई दे रहा है और घटनाक्रम बातचीत की दिशा में आगे बढ़ सकता है। ऐसे समय में किसी भी देश के समर्थन को लेकर बढ़ा-चढ़ाकर बयान देना संवेदनशील कूटनीतिक स्थिति को और जटिल बना सकता है।

सचदेवा ने नेतन्याहू की उस टिप्पणी पर आपत्ति जताई जिसमें उन्होंने कहा कि 1.4 अरब की आबादी वाला भारत इजरायल के साथ खड़ा है। पूर्व राजनयिक के अनुसार, यह बात कहना जरूरी नहीं था, क्योंकि भारत ने ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान का समर्थन नहीं किया है। भारत का रुख संघर्ष खत्म करने, नागरिकों की सुरक्षा और कूटनीतिक समाधान पर केंद्रित है।

Also Read – Indus Waters Treaty – कश्मीर और सिंधु संधि पर पाकिस्तान का दांव, अमेरिका में उठाया मुद्दा…

Netanyahu Made An Unnecessary Remark
Netanyahu Made An Unnecessary Remark

भारत का वास्तविक रुख क्या है?

भारत और इजरायल के बीच रक्षा, कृषि, तकनीक, व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्र में मजबूत संबंध हैं। प्रधानमंत्री मोदी और नेतन्याहू के बीच व्यक्तिगत स्तर पर भी अच्छे संबंध माने जाते हैं। लेकिन द्विपक्षीय मित्रता का अर्थ यह नहीं है कि दोनों देश हर अंतरराष्ट्रीय संकट पर एक ही पक्ष में खड़े हों।

ईरान-इजरायल संघर्ष को लेकर भारत ने संयमित रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि नरेंद्र मोदी ने क्षेत्रीय स्थिति पर नेतन्याहू से बात की, हालिया घटनाक्रम को लेकर भारत की चिंताएं साझा कीं और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। भारत ने जल्द से जल्द शत्रुता समाप्त करने की आवश्यकता भी दोहराई थी।

इससे साफ है कि भारत इजरायल के साथ संवाद बनाए रखना चाहता है, लेकिन सैन्य कार्रवाई का खुला समर्थन नहीं कर रहा। यही अंतर महेश सचदेवा नेतन्याहू के बयान में रेखांकित करना चाहते हैं।

अमेरिका और इजरायल के बीच भी मतभेद

महेश सचदेवा ने इजरायल और अमेरिका के संबंधों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि ईरान के खिलाफ शुरुआती सैन्य कार्रवाई में अमेरिका और इजरायल की भूमिका एक जैसी दिखाई दी, लेकिन बाद में अमेरिका ने ईरान के साथ बातचीत की संभावनाओं को अलग दिशा में आगे बढ़ाने की कोशिश की।

उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ संभावित समझौते या वार्ता के प्रयास को इजरायल के सैन्य दृष्टिकोण से अलग रखने की कोशिश की। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका और इजरायल के बीच भी रणनीति को लेकर पूरी तरह समानता नहीं है।

सचदेवा के अनुसार, अगर अमेरिका जैसा प्रमुख सहयोगी भी बातचीत का रास्ता तलाश सकता है, तो भारत की संतुलित नीति को इजरायल के पक्ष में सैन्य समर्थन के रूप में पेश करना सही नहीं है।

मोदी और नेतन्याहू की बातचीत में क्या हुआ?

नेतन्याहू ने शुक्रवार को कहा कि भारत और इजरायल अपने द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करते रहेंगे। इससे संकेत मिलता है कि दोनों देश अपने पारंपरिक सहयोग को जारी रखना चाहते हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार, फोन कॉल इजरायल की ओर से की गई थी। बातचीत का उद्देश्य कई क्षेत्रों में भारत-इजरायल साझेदारी को मजबूत करना था। हालांकि, भारत की ओर से जारी जानकारी में ईरान के खिलाफ इजरायली सैन्य कार्रवाई के समर्थन जैसी कोई बात नहीं कही गई।

यही वजह है कि पूर्व राजनयिक नेतन्याहू की टिप्पणी को भारत के आधिकारिक रुख से अलग मानते हैं। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच संबंध मजबूत हैं, लेकिन क्षेत्रीय युद्ध और सैन्य कार्रवाई पर दोनों की प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं।

क्या भारत-इजरायल संबंधों पर असर पड़ेगा?

फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि इस बयान से भारत और इजरायल के द्विपक्षीय संबंधों पर बड़ा असर पड़ेगा। दोनों देशों के बीच रक्षा सौदे, तकनीकी सहयोग, खुफिया संपर्क और व्यापारिक संबंध लंबे समय से मजबूत हैं।

लेकिन कूटनीतिक स्तर पर भारत यह जरूर चाहेगा कि उसके रुख को किसी भी पक्ष के समर्थन के रूप में गलत तरीके से पेश न किया जाए। भारत पश्चिम एशिया में अपने नागरिकों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देता है।

निष्कर्ष

महेश सचदेवा की आपत्ति का मुख्य कारण यह है कि नेतन्याहू ने भारत की मित्रता को ईरान के खिलाफ इजरायली सैन्य अभियान के समर्थन के रूप में पेश किया। जबकि भारत का आधिकारिक रुख नागरिकों की सुरक्षा, तनाव कम करने और जल्द शत्रुता समाप्त करने का है।

इसलिए भारत-इजरायल संबंधों में गर्मजोशी होने के बावजूद यह मानना सही नहीं होगा कि नई दिल्ली पश्चिम एशिया के मौजूदा युद्ध में इजरायल के सैन्य रुख का समर्थन कर रही है। नेतन्याहू की टिप्पणी ने इसी संवेदनशील अंतर को धुंधला कर दिया है।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *