Super El Nino – प्रशांत महासागर में बन रही गर्म समुद्री लहरें अल नीनो को फिर सक्रिय कर सकती हैं, और अगर यह ताकतवर रूप लेती है तो भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर दबाव बढ़ सकता है। इसका सबसे बड़ा खतरा कम बारिश, लंबे सूखे अंतराल और खेती पर असर के रूप में दिख सकता है…
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केल्विन वेव क्या है?
प्रशांत महासागर में सामान्य तौर पर व्यापारिक हवाएं गर्म पानी को पश्चिम की तरफ धकेलती हैं। जब ये हवाएं कमजोर पड़ती हैं, तो समुद्र के नीचे गर्म पानी की एक विशाल लहर पूर्व की ओर बढ़ने लगती है, जिसे केल्विन वेव कहा जाता है। यह गर्म पानी समुद्र की सतह को ऊपर उठाता है और ठंडे पानी को ऊपर आने से रोकता है, जिससे अल नीनो की स्थिति बनती है।
सैटेलाइट ने कैसे पकड़ा संकेत?
जानकारी के मुताबिक, नासा और उसके सहयोगियों के सैटेलाइट ने समुद्र की सतह की ऊंचाई में बदलाव को पकड़ लिया है। इसी से वैज्ञानिकों को पता चला कि गर्म पानी की यह लहर प्रशांत महासागर में बड़े क्षेत्र में फैल रही है। समुद्र की सतह में करीब 15 सेंटीमीटर तक बढ़ोतरी देखी गई, जो इस गर्मी के असर का अहम संकेत मानी जा रही है।
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सुपर अल नीनो से क्या खतरा?
अगर समुद्र का तापमान औसत से करीब 2°C ऊपर जाता है, तो इसे बहुत मजबूत अल नीनो की श्रेणी में रखा जा सकता है। इतिहास में ऐसे हालात कई बार दुनिया भर में मौसम को बिगाड़ चुके हैं। भारत के लिए इसका सीधा मतलब है कि मानसून कमजोर पड़ सकता है, बारिश का वितरण असमान हो सकता है और कुछ इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।
भारत पर असर
भारत की खेती, जलस्रोत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। इसलिए अल नीनो के मजबूत होने पर खरीफ फसलों, बिजली उत्पादन और पानी की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। हालांकि, इंडियन ओशन डाइपोल जैसे कुछ दूसरे समुद्री कारक इस असर को कुछ हद तक कम भी कर सकते हैं।
अब क्या देखना होगा?
अभी सबसे अहम बात यह है कि अल नीनो कितनी तेजी से मजबूत होता है और क्या यह वास्तव में “सुपर” श्रेणी तक पहुंचता है। मौसम विशेषज्ञ आने वाले महीनों में समुद्र के तापमान, हवाओं और बारिश के पैटर्न पर लगातार नजर रखेंगे। अगर यह रुझान बना रहता है, तो भारत को मानसून के लिहाज से सतर्क रहना होगा।
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