पैसिफिक मॉल के पास झुग्गियों पर चला बुलडोजर – राजधानी दिल्ली में अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ प्रशासन का अभियान लगातार तेज होता जा रहा है। मालवीय नगर अग्निकांड और साकेत बिल्डिंग हादसे के बाद दिल्ली सरकार भी सख्त रुख अपनाए हुए है…
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इसी कड़ी में सोमवार को पूर्वी दिल्ली के पैसिफिक मॉल के पास बनी झुग्गियों पर बुलडोजर चला, जिसके बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय लोग रोते-बिलखते अपनी बेबसी और नाराजगी जाहिर करते दिखे।
प्रशासन की कार्रवाई से मचा हड़कंप
पैसिफिक मॉल के पास स्थित झुग्गी बस्ती में दिल्ली नगर निगम की टीम भारी पुलिस बल के साथ पहुंची। जैसे ही तोड़फोड़ शुरू हुई, इलाके में हड़कंप मच गया। किसी भी तरह की कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए मौके पर पुलिस की तैनाती बढ़ा दी गई। लोगों में डर, गुस्सा और बेचैनी साफ दिखाई दी।
प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई नाला निर्माण के लिए की जा रही है। लेकिन स्थानीय लोग इसे अपनी बस्ती पर सीधा हमला बता रहे हैं। उनका आरोप है कि शुरुआत में सिर्फ 4 फुट जगह तोड़ने की बात कही गई थी, लेकिन बाद में 10 फुट से ज्यादा हिस्सा ढहा दिया गया।
लोगों का दर्द और गुस्सा
झुग्गी में रहने वाले परिवारों का कहना है कि वे सालों से यहां रह रहे हैं और उनके पास अपने घरों के कई दस्तावेज भी मौजूद हैं। एक लड़की ने भावुक होकर कहा कि वह दिल्ली में ही पैदा हुई है और उसका परिवार कई दशकों से यहीं रह रहा है। उसके मुताबिक, उसकी मां को यहां रहते 30 साल हो गए, ताई को 35 से 40 साल और कई घर 50 साल से बसे हुए हैं।
लोगों का सवाल है कि जब उनके पास सारे प्रूफ हैं, तो उनकी बस्ती को अवैध कैसे कहा जा सकता है। उनका कहना है कि जिन झुग्गियों के पास कोई दस्तावेज नहीं होते, उन्हें अवैध कहा जा सकता है, लेकिन यहां तो पहचान और निवास से जुड़े कागज मौजूद हैं।
“जहां झुग्गी, वहां मकान” का सवाल
पीड़ित लोगों ने सरकार के पुराने वादों को भी याद दिलाया। उन्होंने कहा कि सरकार ने “जहां झुग्गी, वहां मकान” देने की बात कही थी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। लोगों का कहना है कि मकान बनने की बजाय उनके बने बनाए घर ही तोड़ दिए गए।
एक महिला ने रोते हुए कहा कि अगर उन्हें अवैध ही मानना था तो पहले नोटिस देना चाहिए था, ताकि वे कोई दूसरी व्यवस्था कर पाते। उसके मुताबिक, पहले कभी कोई नोटिस नहीं आया और अचानक बुलडोजर चलाकर पूरी बस्ती उजाड़ दी गई। यही कारण है कि लोग प्रशासन की कार्रवाई को धोखा और अन्याय बता रहे हैं।
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नोटिस और दावा
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अधिकारियों ने तोड़फोड़ से पहले सिर्फ ढाई-चार फुट हिस्से की बात कही थी। लेकिन बाद में कार्रवाई बहुत ज्यादा हिस्से पर कर दी गई। लोगों का कहना है कि अगर वास्तव में नाला बनाना था, तो पहले साफ-साफ सीमांकन करना चाहिए था और फिर उसके हिसाब से काम होना चाहिए था।
एक पीड़ित महिला ने कहा कि अगर दीवार खींचनी थी, तो बाहर से खींची जाती, ताकि लोग अपनी सुविधा के हिसाब से रास्ता निकाल लेते। उनके मुताबिक, अचानक घरों का बड़ा हिस्सा गिरा देना बिल्कुल गलत है।
प्रशासन बनाम स्थानीय लोग
यह पूरा मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई और गरीबों की बेबसी के टकराव के रूप में देखा जा रहा है। एक तरफ सरकार और नगर निगम अवैध निर्माण हटाने और सार्वजनिक कामों के लिए जमीन खाली कराने की बात कह रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय लोग इसे बिना पर्याप्त सूचना के की गई सख्त कार्रवाई बता रहे हैं।
लोगों का कहना है कि अगर वास्तव में कोई विकास कार्य होना है, तो उसकी कीमत बेघर लोगों को नहीं चुकानी चाहिए। वे चाहते हैं कि पहले पुनर्वास की व्यवस्था हो, फिर तोड़फोड़ की कार्रवाई की जाए। इसी मांग को लेकर इलाके में नाराजगी और तनाव बना हुआ है।
क्यों बढ़ा विवाद
दिल्ली में हाल के हादसों के बाद प्रशासन की निगाहें अवैध निर्माण पर टिकी हुई हैं। लेकिन झुग्गी बस्ती में रहने वाले गरीब परिवारों का तर्क है कि हर झुग्गी को एक ही नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। कई लोग दशकों से वहां रह रहे हैं, बच्चों की पढ़ाई, रोज़गार और जिंदगी सब उसी जगह पर टिकी हुई है। ऐसे में अचानक घर टूट जाना उनके लिए किसी आपदा से कम नहीं है।
यही वजह है कि पैसिफिक मॉल के पास हुई यह कार्रवाई अब सिर्फ एक तोड़फोड़ नहीं रही, बल्कि अधिकार, पुनर्वास और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल बन गई है।
निष्कर्ष
पैसिफिक मॉल के पास हुई इस कार्रवाई ने कई परिवारों को बेघर कर दिया और लोगों के मन में गहरी नाराजगी छोड़ दी। प्रशासन अपने फैसले को विकास और नाला निर्माण से जोड़ रहा है, जबकि स्थानीय लोग इसे अन्याय और वादाखिलाफी मान रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिनके पास अपने घरों के “सारे प्रूफ” हैं, वे खुद को अवैध कैसे मानें।
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