Mamata Banerjee Viral News – पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी गुरुवार को अलग अवतार में नजर आईं। चुनाव के बाद हुई हिंसा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के लिए ममता बनर्जी वकील की ड्रेस में कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचीं। लेकिन उनके इस कदम से एक बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। Bar Council of India ने 48 घंटे के भीतर जवाब मांगा है…
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ममता क्यों और किस मामले में पहुंचीं कोर्ट?
कलकत्ता हाई कोर्ट में 2026 के राज्य विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद पश्चिम बंगाल में कथित तौर पर बड़े पैमाने पर हुई तोड़-फोड़ और हिंसा के खिलाफ दायर जनहित याचिकाओं (PILs) पर सुनवाई की जा रही है। यह याचिका टीएमसी नेता और वकील कल्याण बनर्जी के बेटे शिर्षान्या बनर्जी ने दायर की थी।
ममता बनर्जी इसी याचिका में अपना पक्ष रखने के लिए काले कोट में वकील बनकर हाई कोर्ट पहुंचीं। उनके हाथ में केस के दस्तावेजों का एक बंडल था। मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल की अदालत में सुनवाई हुई।
करीब तीन महीने बाद सुप्रीम कोर्ट में पेश होने और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के सिर्फ 10 दिन बाद ममता बनर्जी 14 मई को एक बार फिर वकील के रूप में अदालत पहुंचीं।
कोर्ट से बाहर हुआ विरोध — वकीलों ने धक्का दिया
हालांकि अदालत से बाहर निकलते वक्त उनका अनुभव सुखद नहीं रहा। ममता ने आरोप लगाया कि कुछ वकीलों ने उनके खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और उन्हें धक्का भी दिया। इसके बाद वह नाराजगी जाहिर करते हुए कोर्ट परिसर से निकल गईं।
Bar Council of India का नोटिस — दो दिन में जवाब दो
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस संबंध में पश्चिम बंगाल बार काउंसिल को पत्र लिखा है। BCI ने 2 दिनों के भीतर एनरोलमेंट, प्रैक्टिस के निलंबन/पुनः शुरू होने और प्रैक्टिस के प्रमाण-पत्र से जुड़ी विस्तृत जानकारी मांगी है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रधान सचिव श्रीरामंतो सेन ने पत्र में लिखा — “ममता बनर्जी 2011 से 2026 तक बंगाल की मुख्यमंत्री के पद पर कार्य किया। इस समय के दौरान उनके संवैधानिक सार्वजनिक पद को ध्यान में रखते हुए, बीसीआई को उनके रजिस्ट्रेशन, वकालत, निलंबन की स्थिति आपके रिकॉर्ड से वेरिफाई करने की जरूरत है।”
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कोर्ट में केस लड़ने के लिए कौन-सी शर्तें जरूरी?
यह वह केंद्रीय सवाल है जो इस पूरे विवाद के पीछे है।
कोर्ट में दलील देने का अधिकार Advocates Act, 1961 और Bar Council of India (BCI) के नियमों से तय होता है। LLB डिग्री यह तो साबित करती है कि किसी व्यक्ति ने कानून की पढ़ाई की है, लेकिन इससे अपने आप अदालत में केस लड़ने, जज के सामने बहस करने या वकालतनामा दाखिल करने का अधिकार नहीं मिलता।
Advocates Act, 1961 के मुताबिक, अदालत में दलील देने का अधिकार सिर्फ उसी व्यक्ति को है जिसका नाम किसी State Bar Council में दर्ज हो, जिसने AIBE (All India Bar Examination) पास किया हो और जिसके पास Certificate of Practice हो।
तीन अनिवार्य शर्तें :
- State Bar Council में रजिस्ट्रेशन
- AIBE (All India Bar Examination) पास
- Valid Certificate of Practice
ममता के मामले में दो पेंच — कहां फंसी है समस्या?
यहीं से ममता बनर्जी के मामले में विवाद शुरू हुआ। ममता बनर्जी ने अदालत में वकील के वस्त्र पहनकर खुद दलील देने की कोशिश की। इसके बाद सवाल उठा कि क्या वे सिर्फ याचिकाकर्ता के रूप में पेश हो रही थीं, या अधिवक्ता के रूप में? यहीं दो स्तर पर पेंच फंसा।
पहला पेंच — LLB और वकील में फर्क : कानून की डिग्री होना और वकील होना दो अलग मामले हैं। अगर किसी व्यक्ति ने बार काउंसिल में नाम दर्ज नहीं कराया या उसके पास वैध प्रैक्टिस सर्टिफिकेट नहीं है, तो वह अदालत में वकील की तरह पेश नहीं हो सकता।
दूसरा पेंच — CM पद और प्रैक्टिस : नियम है कि अगर कोई वकील संविधान के अनुसार लाभ के पद पर रहता है तब वह वकील के रूप में प्रैक्टिस नहीं कर सकता। उसे बार काउंसिल को लिखकर उस अवधि के लिए विराम लेने और पद से हटने के बाद दोबारा प्रैक्टिस की अनुमति लेना अनिवार्य है।
यानी सवाल यह है — 2011-2026 के 15 साल तक CM रहते हुए ममता ने प्रैक्टिस विराम की अनुमति ली थी या नहीं? और क्या उन्होंने बाद में दोबारा प्रैक्टिस की अनुमति ली?
सुप्रीम कोर्ट में और भी सख्त हैं नियम
सुप्रीम कोर्ट में तो शर्तें और भी सख्त हैं। सुप्रीम कोर्ट में किसी केस में वकालतनामा दाखिल करने और दलील रखने का अधिकार सिर्फ Advocate-on-Record (AOR) को होता है। इसके लिए परीक्षा पास करना जरूरी है। बिना AOR बने कोई भी व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट में नियमित रूप से बहस नहीं कर सकता।
ममता की कानूनी यात्रा — 1990 से 2026 तक
ममता बनर्जी LLB डिग्री होल्डर हैं। 1990 के दशक में ममता कई बार यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं के समर्थन में अदालत पहुंचीं। कभी अलीपुर कोर्ट में तो कभी हुगली जिले के चिनसुरा में। एक मामले में पुलिस फायरिंग में मारे गए व्यक्ति के परिवार की ओर से भी उन्होंने अदालत में बहस की थी।
4 फरवरी 2026 को ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट पहुंची थीं। उन्होंने पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा कराए गए Special Intensive Revision (SIR) को चुनौती देने वाली अपनी याचिका पर खुद बहस की थी।
कब-कब नेताओं ने खुद लड़ा अपना केस?
भारत में कई नेताओं ने अपना केस खुद लड़ा है:
- मनमोहन सिंह : अर्थशास्त्री थे, वकील नहीं — अपने मामलों में वकील ही रखते थे
- राहुल गांधी : 2019 के मानहानि मामले में कोर्ट में खुद पेश हुए (वकील की हैसियत से नहीं, याचिकाकर्ता के रूप में)
- इंदिरा गांधी : कोर्ट में हमेशा वकीलों के जरिए पेश हुईं
खुद को वकील की तरह पेश करना और याचिकाकर्ता के रूप में पेश होना — दोनों में बड़ा फर्क है।
ममता अब क्या कर सकती हैं?
कानूनी रास्ते: ममता बनर्जी इस मामले में याचिकाकर्ता (Petitioner) के रूप में अदालत में मौजूद रह सकती हैं।
यानी ममता कोर्ट में जा सकती हैं, बैठ सकती हैं, लेकिन वकील की तरह बहस करने का अधिकार तभी है जब Bar Council की शर्तें पूरी हों।
निष्कर्ष
ममता के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने आम लोगों के लिए लड़ने की अपनी पुरानी आदत नहीं छोड़ी है। लेकिन हाईकोर्ट के बाहर जिस तरह उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा, उससे उनके आलोचक कह रहे हैं कि अब राजनीतिक हालात बदल चुके हैं।
ममता बनर्जी का यह कदम राजनीतिक संदेश देने का था — “हार के बाद भी लड़ूंगी।” लेकिन कानून की दुनिया में भावनाओं से काम नहीं चलता। Bar Council के नोटिस ने साफ कर दिया है कि LLB की डिग्री और वकालत का प्रमाण-पत्र दो अलग चीजें हैं। अगर ममता की BCI रजिस्ट्रेशन और प्रैक्टिस सर्टिफिकेट की स्थिति साफ नहीं हुई, तो उन्हें कोर्ट रूम में वकील के रूप में पेश होने का अधिकार नहीं होगा।

